नयी दिल्ली , जनवरी 30 -- अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों ने शुक्रवार को एक ऐसी तकनीक का प्रदर्शन किया, जिसकी मदद से वे हजारों किलोमीटर दूर बैठे मरीजों का अल्ट्रासाउंड स्कैन कर सकते हैं, यहां तक कि अंटार्कटिका जैसे दुर्गम वातावरण में भी।
यहां के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान साथ संयुक्त रूप से विकसित की गयी यह प्रणाली डॉक्टरों को 'रोबोटिक आर्म' का उपयोग कर दूरस्थ क्षेत्र से रियल टाइम में स्कैन करने में सक्षम बनाती है। इस तकनीक को संस्थान के 'अनुसंधान दिवस ' समारोह के दौरान प्रदर्शित किया गया।
संस्थान के बयान के मुताबिक, यह तकनीक भारत के अंटार्कटिक अनुसंधान स्टेशन मैत्री में पहले ही तैनात की जा चुकी है।
एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि यह टेली-रोबोटिक हेल्थकेयर प्लेटफॉर्म उन क्षेत्रों में स्टोमक और ट्रॉमा स्कैन, कार्डिएक इमेजिंग तथा वैस्कुलर डॉपलर अध्ययन जैसी महत्वपूर्ण जांच करने में सक्षम बनाता है, जहां चिकित्सा बुनियादी ढांचा न के बराबर या बहुत कम है।
उन्होंने कहा कि यह प्रणाली दूर के इलाकों, आपदा वाले इलाकों, अधिक ऊंचाई वाली जगहों और दूसरी कम सुविधाओं वाले इलाकों में नैदानिक निर्णय लेने में मदद कर सकती है। इस मौके पर बतौर मुख्य वक्ता अनुसंधान राष्ट्रीय रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. शिवकुमार कल्याण रमन ने कहा, "कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) को विज्ञान और अभियांत्रिकी से जोड़ने से अनुसंधान को तेज करने और समाज की मुश्किल चुनौतियों से निपटने के पहले कभी नहीं देखे गये मौके मिलते हैं।"उन्होंने कहा कि एम्स जैसे संस्थान इन तकनीकों में हुई तरक्की को ऐसे समाधान में बदलने में अहम भूमिका निभाते हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और देश के विकास के लिए लाभकारी हैं।
नयी दिल्ली के एम्स के डीन (अनुसंधान) डॉ. निखिल टंडन ने बताया कि वर्तमान में यहां 1,000 से अधिक जैव-चिकित्सा अनुसंधान परियोजनाओं का संचालन हो रहा है। इन्हें 300 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का समर्थन प्राप्त है, जो इसे देश के सबसे सक्रिय सार्वजनिक-क्षेत्र के अनुसंधान केंद्रों में से एक बनाता है।
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