जयपुर , जनवरी 16 -- राजस्थान में राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि जो कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए लंबे समय तक कोई कदम नहीं उठाते, वे बाद में अदालत से राहत नहीं मांग सकते। न्यायाधीश आनंद शर्मा की एकल पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अत्यधिक देरी और निष्क्रियता किसी भी दावे की वैधता को कमजोर कर देती है।

यह फैसला उस मामले में आया जिसमें एक कर्मचारी ने करीब 30 वर्ष बाद याचिका दायर की। मामला वर्ष 1994 से संबंधित था, लेकिन कर्मचारी ने 2024 में जाकर अदालत का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने कहा कि इतने लंबे समय तक चुप बैठे रहने के बाद व्यक्ति को यह अधिकार नहीं रह जाता कि वह अदालत से तुरंत न्याय की अपेक्षा करे। न्यायालय ने कहा कि कानून उन लोगों की सहायता करता है जो अपने अधिकारों के प्रति सजग और सक्रिय रहते हैं। इतने वर्षों की देरी से न केवल दस्तावेज़ और साक्ष्य कमजोर हो जाते हैं, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी अनावश्यक बोझ पड़ता है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि बिना उचित कारण बताए की गई देरी न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। इसलिए, याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया गया।

न्यायाधीश आनंद शर्मा ने गजेंद्र प्रताप सिंह बनाम अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड सहित दो अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से करीब 30 वर्ष की देरी से दायर की गई वेतन पुनर्निर्धारण से संबंधित याचिकाओं को खारिज करते हुए यह फैसला दिया।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित