जयपुर , जनवरी 20 -- राजस्थान उच्च न्यायालय ने सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक और अपीलीय आदेशों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल "रिकॉर्ड और जवाब पर विचार किया गया" जैसे सामान्य वाक्यांश लिख देना पर्याप्त नहीं माना जाएगा।

मंगलवार को दिए गए एक अहम फैसले में न्यायाधीश आनंद शर्मा ने कहा कि ऐसे आदेशों में जवाबदेही, तर्क और स्पष्ट कारणों का संपूर्ण उल्लेख होना आवश्यक है तभी वे न्यायिक समीक्षा में टिक सकेंगे।

उन्होंने कहा कि अनुशासनात्मक प्रक्रिया केवल औपचारिकता भर नहीं हो सकती है। निर्णय लेने वाले अधिकारी को कर्मचारी के बचाव पक्ष, तथ्यात्मक रिपोर्ट और सबूतों की गंभीरता से जांच करके उसके आधार पर स्पष्ट और तर्कपूर्ण निर्णय देना आवश्यक है। केवल यह लिख देना कि "विचार किया गया" पर्याप्त नही है।

ऐसा ही मामला जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (जेवीवीएनएल) के एक सहायक अभियंता राजेश कुमार तिवारी का सामने आया। उन पर आरोप था कि स्क्रैप सामग्री की नीलामी में उन्होंने नई जी.आई. वायर को स्क्रैप बताकर बाहर भेजने का प्रयास किया। इससे निगम को संभवतः वित्तीय नुकसान हुआ। इसके आधार पर अनुशासनात्मक अधिकारी ने उन्हें दंड स्वरूप वेतन में कटौती की सजा दी। अपीलीय अधिकारी ने भी इसी आधार पर अपील खारिज कर दी।

हालांकि, अनुशासनात्मक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी ने अपने आदेशों में केवल औपचारिक रूप से "रिकॉर्ड और जवाब पर विचार किया गया" लिखा था, लेकिन कर्मचारी की लिखित सफाई और तथ्यात्मक आधार पर वास्तविक विचार का कोई विवरण नहीं दिया था। इस आधार पर हाईकोर्ट ने आदेशों को रद्द कर दिया।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी केवल शब्दों के इस्तेमाल से बचें और तथ्यात्मक विश्लेषण, सुबूतों का तुलनात्मक अध्ययन और कर्मचारी की सफाई पर गंभीरता से विचार करके आदेश में स्पष्ट उल्लेख करें। आदेश में कारण न देने से निर्णय मनमाना माना जाएगा।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका सिर्फ़ निचले आदेश की औपचारिक पुष्टि नहीं होती, बल्कि अपीलीय जांच के दौरान स्वतंत्र, निष्पक्ष और तर्कपूर्ण समीक्षा करके वास्तविक निर्णय देना उसकी जिम्मेदारी है। केवल औपचारिक शब्दों से काम चलाना कानून की मूल भावना के खिलाफ है।

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