बदायूं, नवम्बर 3 -- ककोड़ाधाम, संवाददाता। मेला ककोड़ा का इतिहास ऐसे नहीं रचा गया है इसके लिए भी बाबा और मंहतों ने काफी जंग लड़ी है। इतना ही नहीं मेला ककोड़ा का इतिहास हाईकोर्ट तक गया था और लौटकर फिर गंगा की कटरी में आ गया। क्योंकि मेला के इतिहास के बदलाव में एमएलए ने भी अपनी हस्तक्षेप रखा है। लेकिन हाईकोर्ट के इस आदेश ने मेला ककोड़ा को अपने पंखों पर निर्भर उड़ता पक्षी की तरह छोड़ा दिया। कि ककोड़ा देवी के आसपास क्षेत्र में जहां भी गंगा नदी बहेंगी वहीं गंगा नदी के किनारे मेला ककोड़ा लगाया जायेगा। रूहेलखंड में मिनीकुंभ कहे जाने वाला मेला ककोड़ा का इतिहास के झरोंकों में डगमगाता रहा है। मेला ककोड़ा करीब पांच सौ वर्ष से अधिक पुराना है। कई लोगों ने इतिहास को इधर-उधर ले जाने की सोची लेकिन मंदिर के महंतों ने व ग्रामीणों ने काफी प्रयास किया और मेला कोकड़ा...
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