नई दिल्ली, नवम्बर 9 -- दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जीवनसाथी चुनने की आजादी संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। परिवार या समाज दो बालिग लोगों की शादी करने की पसंद में रुकावट नहीं डाल सकते। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते कहा कि शीर्ष अदालत ने भी माना है कि भारत में जाति का सामाजिक प्रभाव अब भी मजबूत है और अंतरजातीय विवाह एकीकरण को बढ़ावा देकर और जातिगत भेदभाव को कम करके एक जरूरी संवैधानिक और सामाजिक काम करती हैं। जस्टिस संजीव नरूला ने 4 नवंबर को पारित एक आदेश में कहा, ''सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे विवाह राष्ट्र हित में हैं और इन्हें किसी भी पारिवारिक या सांप्रदायिक दखल से कड़ा संरक्षण मिलना चाहिए।'' हाईकोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता संविधान के ...
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