पूर्णिया, जनवरी 9 -- पूर्णिया, हिन्दुस्तान संवाददाता।कभी गांवों की पहचान, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही नदियां आज दम तोड़ रही हैं। जिन धाराओं ने पीढ़ियों तक लोगों को रोज़गार, भोजन और जीवन की रफ्तार दी वही धाराएं अब रेत और दरारों में तब्दील होती जा रही हैं। इसका सबसे बड़ा असर उन समुदायों पर पड़ा है, जिनकी आजीविका सीधे तौर पर नदियों से जुड़ी थी। मछुआरे, नाविक, धोबी, जाल बनाने वाले कारीगर के सामने रोज़गार का गहरा संकट खड़ा हो गया है। टीकापट्टी गांव के विनोद महलदार बताते हैं कि कारी कोशीधर की धारा पूरी तरह सूख चुकी है। पहले इस नदी में सालों भर पानी रहता था। हम लोग रोज़ मछली पकड़ते थे। परिवार का पेट इसी से चलता था। अब नदी में पानी नहीं है, मछली कहां से आएगी? विनोद की तरह दर्जनों मछुआरे आज या तो मजदूरी करने को मजबूर हैं या फिर रोज़गार की...
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