कानपुर, दिसम्बर 1 -- कानपुर, प्रमुख संवाददाता कुछ महीनों की राहत और फिर वही बड़ा भ्रम कि अब तो मैं ठीक हो गया हूं। यही वह सोच है जो एड्स जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हजारों मरीजों को दोबारा खड़ी कर देती है मौत की दहलीज पर। इलाज से उबरने की शुरुआती खुशफहमी कई पीड़ितों को दवा बीच में ही छोड़ने पर मजबूर कर देती है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के एआरटी सेंटर के नए आंकड़े बताते हैं कि इस 'भ्रम' और 'लापरवाही' ने एड्स नियंत्रण की सबसे मजबूत दीवार में भी बड़ी दरार डाल दी है। 2009 से संचालित एआरटी सेंटर के अनुसार अब तक 14,600 एड्स पीड़ित रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। चिंता यह कि इनमें से केवल 5500 मरीज ही नियमित रूप से दवा ले रहे हैं। यानी करीब 37% मरीज इलाज को अधूरा छोड़ चुके हैं। अधिकांश ने सिर्फ इसलिए कि शुरुआती तकलीफ कम हुई और उन्हें लगा बीमारी खत्म हो ...
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