विद्यानिवास मिश्र, फरवरी 10 -- आशुतोष शिव भारतीय मन को सहज ही लुभाते हैं। ऐसे देवता से जुड़कर हर एक मन महीप बना रहता है। कभी अनुभव नहीं करता कि वह कहीं से हीन है। हाथ में भिक्षा-पात्र, पर औघड़दानी ऐसे कि कोई खाली हाथ लौटा नहीं, मनमाना लेकर गया। महाशिवरात्रि का पर्व आदि देव महादेव को याद करते हुए स्वयं सदाशिव हो जाने का दिन है। अनोखे-अद्भुत औघड़दानी जरूरी नहीं कि वहां मंदिर खड़ा हो जाए। कभी वह पेड़ के नीचे आराम करते मिल जाएंगे। कभी नदी के बीच पत्थरों के साथ केलि करते मिल जाएंगे। कभी घर-आंगन में छोटी-सी कांसे की थाली में कुछ क्षणों के लिए विराज जाएंगे और कभी केवल बमभोला के बोल में। कभी गीत में, कभी नृत्य में। कभी पत्थर में, कभी सोने में। कभी मिट्टी में, कभी पानी में। कभी वायु में, कभी प्राणों के साथ जपे जाते बीज में। कहां पहुंच जाएंगे, कुछ ...
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