रांची, फरवरी 6 -- रांची, संवाददाता। झारखंड हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के तलाक से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि किसी धार्मिक संस्था, गुरु या सत्संग का अनुयायी होना अपने आपमें तलाक का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि इससे वैवाहिक जीवन पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, तब तक इसे मानसिक क्रूरता का आधार नहीं माना जा सकता। पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी। पति ने अदालत में आरोप लगाया था कि शादी के बाद पत्नी केवल दो दिन ससुराल में रही, वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए और अपने धार्मिक गुरु व सत्संग में अधिक रुचि दिखाती रही। इससे उसे मानसिक प्रताड़ना हुई। उसने इसे मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक की मांग की थी। वहीं, पत्नी ने कोर्ट को बताया कि विवाह के शु...