वाराणसी, दिसम्बर 4 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। काशी और कांचि का रिश्ता तब से है जब से सप्त मोक्षपुरियों का अस्तित्व है। काशी-कांचि के मध्य टूटे संपर्क-संबंध को दो हजार वर्ष पूर्व आदि शंकराचार्य ने जोड़ा था। वह सिलसिला काशी-तमिल संगमम् के माध्यम से फिर गति पकड़ रहा है। उस काल में एक-दूसरे की विद्याएं सीखने-सिखाने के उद्देश्य से काशी और कांचि के विद्वान एक-दूसरे के क्षेत्र में आते-जाते थे। आदि शंकराचार्य के काशी से लौटने के बाद उन्हीं के निर्देश पर चारों पीठों के विद्वान चारों क्षेत्रों में अलग-अलग जाने लगे। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि ज्ञान के चतुर्दिक आदान-प्रदान से उसका संरक्षण लंबे समय तक सुनिश्चित किया जा सकेगा। आदिगुरु शंकराचार्य की इस परिकल्पना के अनुरूप आज काशी ज्ञान की समस्त विधाओं का प्रतिनिधित्व कर रही है। राष्ट्रकवि सुब्रमण्य भ...