कानपुर, मार्च 18 -- मिट्टी के बर्तनों का इतिहास मानव सभ्यता जितना पुराना है। सदियों बाद भी मिट्टी के बर्तनों और खिलौनों का रंग-रूप तो जस का तस है। फर्क महज चाक में आया है। बाजार में हाथ की जगह मोटर से चलने वाले चाक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इलेक्ट्रिक चाक से काम में तेजी तो आई लेकिन कारोबार को औद्योगिक गति नहीं मिल सकी। यही वजह है कि कुम्हार समाज गरीबी से नहीं उबर पा रहा है। कुम्हारों का कहना है कि उनके कारोबार के लिए अभी सरकार से थोड़ी-बहुत मदद मिली है। मिट्टी के बर्तनों के कारोबार को सरकार लघु उद्योग का दर्जा दे तो कुम्हार समाज का उद्धार हो जाएगा। शहर के हर्ष नगर में कुम्हारों की पुरानी बस्ती हुआ करती थी। धीरे-धीरे शहर का आकार बदला तो कुछ कुम्हारों को 1958 में प्रशासन ने काकादेव में विस्थापित कर दिया। शहर के बाबूपुरवा, बाकरगंज, रेलबाजा...
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