समस्तीपुर, जनवरी 5 -- रिश्तों के शहर में जब अपने ही मुंह फेर लें, तब कभी-कभी इंसानियत किसी अजनबी के हाथों से उजागर होती है। चार दिनों तक सदर अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस की ठंडी दीवारों के बीच पड़ी एक महिला की देह सिर्फ एक मृत्यु का विवरण नहीं थी, बल्कि वह समाज, रिश्तों और व्यवस्था की संवेदनहीनता का मूक दस्तावेज बन चुकी थी। अंततः रविवार को अस्पताल प्रबंधन ने उस ज्ञात महिला को अज्ञात मानते हुए अंतिम संस्कार कर दिया। विडंबना यह रही कि जिस मां ने एक बेटे को जन्म दिया, उसी बेटे को उसकी चिता तक आग देने का अधिकार भी न मिल सका। उक्त मृतका को रविवार को जब शव का अंतिम संस्कार किया गया, तो मुखाग्नि बेटे या पति ने नहीं, बल्कि पोस्टमार्टम वाली महिला कर्मचारी मंजू ने दी। जिस मां के आंचल में कभी दस वर्षीय पंकज ने आंखें खोली थीं, उसी मां की चिता को वह मु...