बलरामपुर, फरवरी 19 -- महराजगंज तराई, संवाददाता। रमजान का पवित्र महीना गुनाहों से तौबा और बुराइयों से बचने की तरबियत देकर रोजेदारों की रूह को पाकीज़गी और दिल को सुकून बख्शता है। यह बातें हाजी शफीक अहमद ने कही। उन्होंने बताया कि रमजान का हर रोज़ा, उसका हर घंटा और हर मिनट बेहद अहमियत रखता है। रोजा एक खास इबादत है, जिसका उद्देश्य इंसान में तकवा यानी आत्मसंयम पैदा करना है। उन्होंने कहा कि रोजा केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं, बल्कि हर कौम और हर दौर में किसी न किसी रूप में उपवास की परंपरा रही है। कुरान के अनुसार रोजे का मकसद इंसान के भीतर संयम और परहेज़गारी पैदा करना है। हदीस में रमजान को हमदर्दी और गमख्वारी का महीना बताया गया है, जिसमें जरूरतमंदों की मदद और भलाई पर विशेष जोर दिया गया है। रमजान में की गई इबादत और नेकियों का सवाब कई गुना बढ़ा दिया ...