प्रयागराज, मार्च 18 -- कहानीकार मार्कण्डेय की पुण्यतिथि पर मंगलवार को हिंदुस्तानी एकेडेमी के सभागार में संवाद गोष्ठी का आयोजन हुआ। नयी कहानी आंदोलन और मार्कण्डेय की कहानियां विषय पर प्रो. नीरज खरे ने कहा कि उनकी मूल चेतना ग्रामीण कहानियों से बनती है। जिसमें आजाद भारत के गांव की चिंता उनकी मूल चिंता में थी। आजादी के पहले जो किसान चिंता प्रेमचंद में है, वह आजादी के बाद मार्कण्डेय में है। गांव धीमी गति से बदल रहे थे। इस बदल रहे गांव के कथाकार मार्कण्डेय हैं। प्रो. बसंत त्रिपाठी ने कहा कि भूमि संबंध और जाति व्यवस्था को समझे बिना मार्कण्डेय की रचनाओं को नहीं समझा जा सकता है। आजादी के बाद नए भारत की जितनी बेचैनियां थीं, उसे वे अपनी रचनाओं में रचते थे। राकेश बिहारी ने कहा कि नई कहानी आंदोलन के दौर में स्त्री की उपस्थिति को जिस तरह से देखा गया है...
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