मुजफ्फरपुर, फरवरी 12 -- मुजफ्फरपुर। प्लास्टिक के जमाने में मिट्टी के खिलौने और कलाकृतियां माटी के मोल भी नहीं बिक रहीं, जबकि ये सिर्फ सामान नहीं, बल्कि गांव से जुड़े बचपन की भावनाएं हैं। पीढ़ियों के किस्से को प्रासंगिक बनाते खिलौनों को हस्तशिल्प कला से जुड़ीं शाहपुर की बच्चियां सहेज रही हैं। बड़ी संख्या में महिलाएं और गांव के पुरुष भी इसे रोजगार का जरिया बनाए हुए हैं। ये नए दौर की जरूरतों के सांचे में ढालकर इन कलाकृतियों को उपयोगी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, इनकी पीड़ा है कि सरकार के स्तर से प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। सबसे बड़ी समस्या बाजार और मंच की है। दूसरे लोग इनसे सस्ती दर पर सामान खरीदकर ऊंचे दाम में बेचकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं और ये फाकाकशी की कगार पर हैं। इनका कहना है कि माटी कला बोर्ड की वर्षों पुरानी मांग अगर पूरी...