नई दिल्ली, दिसम्बर 17 -- अमरेंद्र किशोर ,वरिष्ठ पत्रकार भारत में महुआ सिर्फ एक वन-उत्पाद नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन की धुरी है- एक ऐसा फूल, जो इसकी स्मृति, संस्कृति, भोजन, दवा और सामाजिक परंपरा से जुड़ा है। पिछले दो वर्षों में महुआ को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व हलचल हुई है। साल 2022 में पहली बार जनजातीय भारत के लघु वनोपज को लेकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक खबर सामने आई, जब छत्तीसगढ़ से लगभग 750 क्विंटल महुआ पहली बार खाद्यान्न के रूप में ब्रिटेन भेजा गया। इसके अगले वर्ष मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ ने एक ब्रिटिश कंपनी के साथ बड़ा समझौता किया, जिसके तहत 200 टन महुआ लंदन निर्यात करने की सहमति बनी। यह वह क्षण था, जब सदियों से स्थानीय उपयोग तक सीमित महुआ वैश्विक बाजार में एक संभावित 'सुपर-इंग्रीडिएंट' के रूप में उभरा। निर्य...