गोरखपुर, अक्टूबर 28 -- गोरखपुर, वरिष्ठ संवाददाता लोक आस्था के महापर्व छठ को लेकर राप्ती, रोहिन, आमी नदी के साथ गोरखनाथ मंदिर के भीम सरोवर, मानसरोवर, रामगढ़झील और सूर्यकुंडधाम पर आस्था, श्रद्धा, और संस्कृति का अनुपम संगम देखने को मिला। सूर्यदेव की लुकाछिपी के बीच व्रतियों का हुजूम अपने सिर पर डाला उठाए और होठों पर छठ मइया के मधुर लोकगीतों को गुनगुनाते हुए घाट की ओर बढ़ता जा रहा था। कांच ही बांस की बहंगिया, हे माई बहंगी लचकत जाय..., पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार... जैसी पारंपरिक धुनों से छठ घाट गूंज उठे। दोपहर बाद से ही छठ व्रतियों और श्रद्धालुओं का घाट पर आना शुरू हो गया। कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय..सोना सट कुनिया, हो दीनानाथ हे घूमइछा संसार, आन दिन उगइ छा हो दीनानाथ आहे भोर भिनसार..गीतों के बीच बीच व्रती महिलाओं का ...
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