पूर्णिया, जनवरी 4 -- - प्रस्तुति : श्रुतिकांत गांवों की गलियों में गूंजने वाली भक्ति धुनें आज सिमटती जा रही हैं। कीर्तन मंडलियां, जो कभी ग्रामीण समाज में भक्ति, अनुशासन और सामूहिक एकता की प्रतीक थीं, अब आधुनिक संगीत और डीजे संस्कृति के बीच खोती जा रही हैं। ऐसे समय में सहरसा के कहरा स्थित नाथ बाबा कमरथुआ संघ द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित सवा माह का कीर्तन उत्सव इस परंपरा को जीवित रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है। यह आयोजन तीन दशकों से निरंतर चल रहा है और गांव-गांव भ्रमण करते हुए बाबा बासुकीनाथ धाम तक पहुंचता है। आयोजकों का मानना है कि यदि सरकार पारंपरिक कीर्तन मंडलियों को मानदेय, प्रशिक्षण और मंच प्रदान करे तो यह लोकभक्ति परंपरा फिर से सशक्त हो सकती है। स्थानीय लोग भी मानते हैं कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, ज...