भागलपुर, दिसम्बर 5 -- - प्रस्तुति : विजय झा सहरसा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में कभी रंग-बिरंगे पक्षियों की मधुर आवाज से सुबहें जीवंत होती थीं। गौरैया की चहचहाहट, मैना की आवाज, चील और गिद्ध के साए, तथा चौरों में जलीय पक्षियों का कलरव इस क्षेत्र की पहचान था। परन्तु पर्यावरणीय उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता से ये प्राकृतिक धरोहर समाप्ति के कगार पर है। आज प्रवासी पक्षियों के आने तक लोगों को महीनों इंतजार करना पड़ता है। पक्षियों की संख्या में गिरावट खेती और पारिस्थितिकी के लिए खतरा बन गई है। जल कुम्भी के फैलाव से चौर और जलजमाव का स्वाभाविक भोजन खत्म हो गया है, जिससे प्रवासी पक्षी रुकना छोड़ चुके हैं। स्थलीय और जलीय पक्षियों की कमी से कीट नियंत्रण घटा है, किसान रसायनिक कीटनाशकों पर निर्भर हो रहे हैं, जो स्वास्थ्य व मिट्टी के लिए हानिकारक है। कृ...
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