लखीसराय, फरवरी 12 -- प्रस्तुति: मनोज कुमार। कभी मछलियों की बहार और मछुआरों की पुकार से गुलजार रहने वाली किऊल नदी आज अपनी पहचान खोती जा रही है। जिले की जीवनरेखा कही जाने वाली यह नदी और इससे जुड़े 52 तालाब अब प्रदूषण, अतिक्रमण और सूखती धारा की मार झेल रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि जिन जालों में कभी ताजी मछलियां फंसा करती थीं आज उनमें प्लास्टिक, पॉलिथीन और शहर का कचरा निकलता है। नदी का यह बदलता स्वरूप न सिर्फ पर्यावरणीय संकट का संकेत है बल्कि हजारों मछुआरों के सामने आजीविका का बड़ा सवाल भी खड़ा कर रहा है। मछलियों की मंडी से सूने घाट तक का सफर: कुछ वर्ष पहले तक किऊल नदी और जिले के कई तालाबों के घाटों पर सुबह-सुबह मछुआरों की चहलपहल रहती थी। ताजी मछलियों की खरीद बिक्री के लिए दूर दराज के गांवों और बाजारों से व्यापारी पहुंचते थे। जिले के 52 तालाबों ...