मेरठ, अक्टूबर 5 -- मेरठ। मिट्टी को अपने हुनर से विभिन्न रूप देने वाले कलाकार हमें सिर्फ दीपावली पर ही याद आते हैं। अगर कुम्हारों को सही प्रशिक्षण और आसानी से सरकारी योजनाओं का लाभ मिले तो पूरे साल उनकी जिंदगी गुलजार रहेगी, साथ ही उनका रोजगार भी चलता रहेगा। आधुनिकता के इस दौर में कुम्हार आज परेशानी में जी रहे हैं। उन्हें मिट्टी के साथ मार्केट के लिए भी जूझना पड़ता है। अगर मिट्टी से सने इन हाथों को सहारा मिल जाए तो इनकी कला और भी निखर जाएगी। मेरठ शहर में 500 से ज्यादा कुम्हार परिवार हैं, जो हर दिन मिट्टी को आकार देकर उसे सुंदर कृति में बदलते हैं। उनके बनाए बर्तन, दीपक, मूर्तियां, हांडी, सुराही, कलश और सजावटी सामान न सिर्फ स्थानीय बाजारों में बल्कि दूसरे शहरों में भी सप्लाई होते हैं। दीपावली पर ही कुम्हारों को ज्यादा पूछा जाता है। जब दीये से...
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