भागलपुर, सितम्बर 24 -- -प्रस्तुति: शंकर किशोर सिंह बांस से बने सूप और दौहरा एक अद्भुत पारंपरिक कला है, जो आधुनिक युग में भी कुछ समुदायों के प्रयास से जीवित है। लेकिन बढ़ती महंगाई और रोजगार के नए साधनों के बीच इस कला के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। औसतन एक दिन में मेहनत के बाद सिर्फ दो सूप तैयार हो पाता है और पूरा परिवार मिलकर एक सप्ताह में 15 से 16 ही बना पाता है। इनकी बिक्री से परिवार का भरण-पोषण एवं बच्चों की पढ़ाई-लिखाई होती है, पर सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती। झाझा क्षेत्र में विशेषकर गरीब और महादलित परिवार इस परंपरा से जुड़े हैं। शादी-ब्याह और घरेलू कार्यों में इन बांस के सामान का खास महत्व है। भारत की ग्रामीण संस्कृति और परंपरा में कुछ ऐसी कलाएं आज भी जीवित हैं जो न केवल स्थानीय समाज की पहचान हैं बल्कि आजीविका का आधार भी ...
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