वाराणसी, नवम्बर 4 -- वाराणसी। उत्सव प्रेमी काशीवासी कार्तिक पूर्णिमा की संध्या को सर्वांग सुंदरी की तरह सजाते हैं। गंगा घाटों पर प्रज्ज्वलित दीपों से साकार लेने वाला अनूठा सौंदर्य देवगणों को भी सम्मोहित कर देता है। सम्मोहक सौंदर्य के पीछे उन कलाकारों की भी अथक मेहनत होती है जो घाटों पर आकर्षक रंगोली के रूप में कल्पनाओं का इंद्रधनुषी संसार रचते हैं। इन कलाकारों को कसक है कि प्रशासन उनका सम्मान नहीं करता। इससे अधिक कोफ्त होती है जब भीड़ रंगोलियों को रौंद डालती है। तब लगता है कि कला ही रौंदी जा रही है। --- देवदीपावली की शाम स्वर्ग के देव-गंधर्वों के स्वागत में घाटों पर पहले रंगोली की कलात्मक चादर बिछती है, दीप उसके बाद जगमगाने शुरू होते हैं। रंगोली की एक-एक रेखा में सजा रंग कलाकारों के हृदय की आस्था होता है। मगर विडंबना के रूप में एक तल्ख सच...
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