भागलपुर, फरवरी 17 -- -प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज, मोना कश्यप कभी हाथ से चलने वाले चाक की घूमती थाप पर जीवन का संगीत रचने वाले जिले के कुंभकार अब बिजली से चलने वाली जिगर-जोली चाक पर उम्मीदों का भविष्य गढ़ रहे हैं। तकनीक ने उनके काम को आसान जरूर किया है, लेकिन बाजार की सच्चाई अब भी उनकी उंगलियों से चिपकी मिट्टी की तरह भारी है। समेली प्रखंड के तेज नारायण पंडित बताते हैं कि पहले हस्तचालित चाक पर एक-एक कुल्हड़ बनाना मेहनत और धैर्य की परीक्षा होता था। अब जिगर-जोली मशीन से 40 एमएल के छोटे कुल्हड़ से लेकर 250 एमएल तक के डिजाइनर गिलास तेजी से तैयार हो जाते हैं। मशीन ने काम की रफ्तार बढ़ाई है, लेकिन आमदनी नहीं, वे हल्की मुस्कान के साथ कहते हैं। कुल्हड़ बनाने की प्रक्रिया आज भी उतनी ही जटिल है। खास 'कुंभरौटी' मिट्टी बाहर से मंगानी पड़ती है, जिसकी एक...
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