भागलपुर, जनवरी 7 -- -प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज कटिहार समेत आसपास के ग्रामीण इलाकों में कभी कीर्तन का सुर सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की आत्मा हुआ करता था। गांव-गांव सक्रिय कीर्तन मंडलियां, मंजीरा, ढोलक और करताल की ताल पर भक्ति गीतों से वातावरण को पवित्र कर देती थीं। लोग नंगे पांव, पैदल चलकर कीर्तन यात्राओं में शामिल होते थे और पूरा गांव एक सूत्र में बंध जाता था। तीन दशक पहले तक गांव से लेकर कस्बाई इलाके तक नाम-धुन संकीर्तन के आयोजन आम बात थे। असम तक से कीर्तन मंडलियों को बुलाया जाता था। सुसज्जित वेशभूषा में कलाकार भावपूर्ण नृत्य और भक्ति गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे। कीर्तन सिर्फ भजन नहीं था, यह नैतिक शिक्षा, सामाजिक संवाद और सामूहिक अनुशासन का सशक्त माध्यम था। बुजुर्ग बताते हैं कि कीर्तन यात्रा के दौरान...