भागलपुर, दिसम्बर 24 -- - प्रस्तुति : ओमप्रकाश अम्बुज कभी कटिहार और सीमांचल के खेत दालों की हरियाली से लहलहाते थे। अरहर, मसूर और मूंग की फसलें किसानों के पसीने और उम्मीद की खुशबू बिखेरती थीं। लेकिन अब वही खेत खामोश हैं और किसानों का भरोसा डगमगा गया है। मेहनत के बदले उचित दाम न मिलना, सरकारी खरीद व्यवस्था का बिखरना और मौसम की अनिश्चितता ने दलहन खेती की जड़ें हिला दी हैं। बीज, खाद और दवा की महंगाई ने भी इसे घाटे का सौदा बना दिया है। परंपरा, पोषण और मिट्टी की सेहत से जुड़ी यह खेती अब केवल घर की जरूरत तक सिमटने लगी है। कभी सीमांचल की पहचान रही दलहन खेती आज अस्तित्व की जंग लड़ रही है। सवाल यह है कि क्या किसानों की यह टूटती आस फिर कभी हरी हो पाएगी? एक समय था जब कटिहार और पूरे सीमांचल की पहचान दलहन की खुशबू से होती थी। अरहर, मसूर, चना, मूंग, कलाई...
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