पूर्णिया, सितम्बर 3 -- प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज/ मणिकांत रमण कटिहार की धरती पर हर साल बाढ़ और कटाव एक त्रासदी बनकर लौटती है, जो हजारों सपनों को बहा ले जाती है। कुरसेला से मनिहारी तक के लोग बरसात के महीनों को डर और असहायता के साथ बिताते हैं। अपने घर छोड़ रेलवे लाइन, बांध और ऊंचे स्थानों पर शरण लेना उनकी मजबूरी बन गई है। महिलाएं बच्चों को गोद में उठाए सुरक्षित जगह तलाशती हैं, जबकि किसान अपनी डूबी फसल को असहाय नजरों से देखते हैं। बुजुर्ग आंसुओं में सवाल ढूंढते हैं- आखिर कब खत्म होगा यह दर्द? बाढ़ और कटाव के कारण लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। आवागमन मुश्किल हो जाता है, घर और फसलें तबाह होती हैं और जीवन असुरक्षित महसूस होता है। जिले में बाढ़ और कटाव केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हर साल लौटकर आने वाली त्रासदी बन गई है, जिसने...
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