भागलपुर, जनवरी 17 -- -प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज कभी हर मौसम में हरियाली और मेहनत की आवाज़ से गुलजार रहने वाले कटिहार के खेत आज एक अनकही चुप्पी ओढ़े हुए हैं। बीज मिट्टी में जाने को तैयार हैं, पानी और खाद की व्यवस्था भी है, लेकिन खेती की सबसे जरूरी ताकत-कृषि मजदूर-लगातार कम होते जा रहे हैं। खेतों की मेड़ पर खड़े किसान आज सबसे पहले आसमान नहीं, बल्कि रास्ते की ओर देखते हैं कि कोई मजदूर मिल जाए, ताकि फसल समय पर बोई और काटी जा सके। खेती के अलग-अलग चरणों में मजदूरों की भूमिका निर्णायक होती है। गेहूं की खेती में हार्वेस्टर और अन्य मशीनों से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन धान की खेती आज भी पूरी तरह मानव श्रम पर निर्भर है। बिचड़ा की रोपनी, निराई-गुड़ाई और कटनी जैसे काम मशीनों से नहीं, हाथों से होते हैं। यही हाल मूंग, मकई और दलहन फसलों का है, जहां खे...
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