भागलपुर, जून 23 -- प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज, मोना कश्यप हर सुबह कटिहार की सड़कों पर सूरज से पहले शोर उतर आता है-प्रेशर हॉर्न की चीख, धुएं की मोटी परत और धूल का अंधड़। हृदयगंज से फुलवरिया तक सांस लेना तकलीफ बन गया है। बच्चे खांसी में उलझे हैं, बुजुर्गों की सुनने की शक्ति जाती रही और घर साउंडप्रूफ खिड़कियों में कैद हो गए हैं। हर कोने में एक अजीब-सी थकान है-जिसे न कोई सुन रहा, न समझ रहा। शिकायतें थक चुकी हैं, लोग हार मानने को मजबूर हैं। क्या कोई सुनेगा इन सड़कों की घुटती आवाज़ें? या फिर कटिहार की ये हवा हमेशा जहर बनी रहेगी? यह बातें हिन्दुस्तान के बोले कटिहार संवाद के दौरान उभर कर सामने आईं। कटिहार की सड़कों पर अब सिर्फ गाड़ियां नहीं दौड़तीं, बल्कि दौड़ती है एक ऐसी व्यवस्था जो लोगों की सांसों को धीरे-धीरे निगल रही है। हृदयगंज, हाजीपुर, मिर...