भागलपुर, जनवरी 8 -- प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज जिस मिट्टी ने सभ्यता को आकार दिया, आज उसी मिट्टी से जुड़े हाथ खाली होते जा रहे हैं। हजारों साल पुरानी परंपरा को संजोए कुम्हारों की जिंदगी इन दिनों ठंड के मौसम में ठहर सी गई है। न्यू मार्केट, बड़ी बाजार और चालीसा हाट के किनारे सजे मिट्टी के घड़े, सुराही और दीये खरीदारों की बाट जोह रहे हैं, लेकिन ठंड के साथ ही बाजार ठंडा पड़ गया है। न ग्राहक हैं, न मोलभाव की आवाजें-बस खामोशी और भविष्य की चिंता। कभी हर घर की पहचान रहे मिट्टी के बर्तन आज आधुनिक जीवनशैली की मार झेल रहे हैं। फ्रिज और वाटर कूलर ने घड़ों और सुराहियों की जगह ले ली है। गर्मी के कुछ महीनों को छोड़ दें तो साल भर इस पुश्तैनी कारोबार में मंदी छाई रहती है। ठंड के मौसम में हालात और बिगड़ जाते हैं। कुम्हारों का कहना है कि महीनों की मेहनत से त...
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