उरई, मार्च 7 -- उरई। कौन सुनेगा किसको सुनाएं इसलिए चुप रहते हैं। आंख से आंसू बह न जाए.. ये चंद लाइनें शहर के उन साहित्यकारों व कवियों पर सटीक बैठती है, जो शासन प्रशासन की उपेक्षा से मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी से कराह रहे हैं। उरई में साहित्यकार व कवि उपेक्षा के शिकार हैं। साहित्य की फसलें बिना सुविधाओं के अच्छे से खिल नहीं पा रही हैं। साहित्यकारों ने कहा कि जिले में कम से कम एक साहित्य भवन तो होना ही चाहिए, जहां बैठकर हम आपस में चर्चा कर सकें। आधुनिकता के इस युग में तनाव भरी जिंदगी से जूझ रहे लोगों के जीवन में वीर, हास्य काव्यों से थोड़ी देर ही सही, रस घोलने वाले शहर के साहित्यकार व कवि इन दिनों उलझनों से घिरे हुए हैं, न तो उनके पास खुद का कोई भवन है और न ही सरकारी सहायता मिल रही। सरकारी आयोजन जब भी होते हैं तो सिर्फ औपचारिकता तक ही सीमित र...
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