नई दिल्ली, अक्टूबर 6 -- नई दिल्ली, प्रमुख संवाददाता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि जमानत मिलने के बाद वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए खुशी जाहिर करना जमानत रद्द करने का आधार नहीं हो सकता। हाईकोर्ट से कहा कि जब तक यह साबित न हो कि ऐसा कदम शिकायतकर्ता को धमकाने या डराने के इरादे से उठाया गया है। न्यायमूर्ति रविन्द्र डुडेजा की पीठ ने यह टिप्पणी शिकायतकर्ता जफीर आलम की याचिका खारिज करते हुए की। याचिका में नरेला औद्योगिक क्षेत्र थाने में दर्ज एक आपराधिक मामले में आरोपी मनीष की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी। आरोप था कि मनीष और उसके साथियों ने हथियार लहराए, सोशल मीडिया पर अप्रत्यक्ष धमकियां दीं और मोहल्ले में डर फैलाया। साथ ही दावा किया गया कि एक सह-आरोपी को शिकायतकर्ता के घर के बाहर देखा गया। पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद स्क्र...
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