नवादा, अक्टूबर 15 -- नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। भारतीय लोकतंत्र की नींव मजबूत है, पर हाल के वर्षों में चुनावों का खर्च जिस तेजी से बढ़ा है, उसने गंभीर चिंता पैदा कर रही हैं। एक समय था जब चुनाव वैचारिक संघर्ष और जनसंपर्क पर आधारित होते थे, लेकिन अब वे धनबल की खुली प्रतिस्पर्धा बन गए हैं। राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और यहां तक कि चुनाव आयोग का बजट भी आसमान छू रहा है। यह बढ़ता हुआ चुनावी खर्च न केवल सरकारी खजाने पर बोझ डालता है, बल्कि ईमानदार और साधनहीन उम्मीदवारों के लिए चुनावी मैदान में टिके रहना भी मुश्किल बना रहा है। इससे राजनीति में भ्रष्टाचार, काला धन और अपारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है। यह प्रवृत्ति अंततः आम आदमी की भागीदारी को कम करती है, जिससे हमारे लोकतंत्र की मूल भावना ही कमजोर होती दिख रही है। यह बातें आपके अपने अखबार हिन्दुस्तान...