हल्द्वानी, अगस्त 18 -- - बिणाई, डौंर और जौयां मुरली जैसे पारम्परिक वाद्ययंत्रों के संरक्षण में जुटे लोग बने प्रेरणा - शगुन आखर जैसी गायन शैलियों को संजोने में महिलाएं निभा रहीं अहम भूमिका - पैतृक कला को संजोने के साथ ही नई पीढ़ी को भी दे रहे परम्परागत ज्ञान हल्द्वानी। उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में लोक संगीत, वाद्ययंत्र और गायन शैलियों का अहम स्थान है। ऐसे में अभी भी कई कलाकार अपनी पैतृक कलाओं को जीवित रखने के लिए समर्पित हैं। ये कलाकार बिणाई, डौंर और जौयां मुरली जैसे वाद्ययंत्रों और शगुन आखर जैसी गायन शैलियों को संरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं, जो आधुनिकता और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में धीरे-धीरे विलुप्त हो रही हैं। इन कलाकारों का मानना है कि इन कलाओं को बचाने के लिए सरकार के साथ-साथ आम जनता और विशेष रूप से युवा पीढ़ी का...
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