अमरोहा, दिसम्बर 14 -- शहर की गलियों में पल बढ़कर जवान हुआ एक मुस्लिम शायर ऐसा भी था जो पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के बीच और दहशतगर्दी के साए में रहकर भी गंगा का पुजारी रहा। अमरोहा में ब्रजघाट और गढ़मुक्तेश्वर से होकर गुजर रही देश-दुनिया के लाखों-करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के संगम गंगा नदी से बिछड़ने का मलाल उसकी शायरी में वक्त-वक्त पर छलकता रहा। बात जब इस तरह की बेबाकी से जुड़ी हो तो जहन में सिर्फ एक ही नाम कौंधता है और वो नाम है जॉन एलिया का। जिनका जन्म 14 दिसंबर 1931 को अमरोहा शहर के मोहल्ला लकड़ा में शफीक हसन एलिया के घर हुआ था। साल 1957 में 26 साल की उम्र में देश के बंटवारे का जख्म सीने में दबाकर पाकिस्तान गए जॉन एलिया ने अपनी जिंदगी के बाकी 45 साल वहां खून के आंसुओं के साथ रो-रोकर गुजारे, इस बात की तसदीक खुद उनकी शायरी कर रही है। पैरो...
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