वाराणसी, जनवरी 17 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। एक समय ऐसा भी था जब कथक नृत्य श्रीकृष्ण और राधा की कथाओं तक ही सिमटा रहा। इस विधा में नवीन विधाओं को सम्मिलित करने का श्रेय पं. बिरजू महाराज को ही जाता है। उनका जन्म भले ही प्रयागराज के हंडिया में हुआ था, लेकिन वह काशी को अपना दूसरा घर मानते थे। कथक के पुरोधा पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज से जुड़ी यह यादें उनकी चौथी पुण्यतिथि (17 जनवरी) की पूर्व संध्या पर उनकी शिष्य मंडली ने आप के अपने अखबार 'हिन्दुस्तान' से साझा कीं। संगीता सिन्हा ने कहा कि उनके अंदर एक बहुमुखी कलाकार के साथ ही साथ जिज्ञासा से परिपूर्ण एक अभियंता भी था। ऐसा कई बार हुआ जब उन्होंने अपनी कार में हुई गड़बड़ी खुद ही ठीक कर ली। वह बिजली के काम में भी वह बहुत माहिर थे। पं. बिरजू महाराज के शिष्य आशीष सिंह 'नृत्यमंजरी दास' ने बताया कि ...