पटना, जनवरी 15 -- बिहार के रंगकर्मी डॉ.चतुर्भुज नाट्य-साहित्य के पुरोधा थे। नाट्य-साहित्य को मंचन-योग्य शिल्प देकर उन्होंने न केवल रंग-मंच को समृद्ध किया बल्कि अपनी मोहक काव्य-कल्पनाओं से ऐतिहासिक नाटकों को विपुल समृद्धि प्रदान की। दूसरी ओर कवि विशुद्धानन्द एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने अपने मर्म-स्पर्शी गीतों से हिन्दी के काव्य-साहित्य को नूतन ऊर्जा दी। यह बातें गुरुवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-सह-सम्मान समारोह एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि विशुद्धा जी ने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य और संस्कृति-कर्म को दिया। वे एक पूर्णकालिक कलमजीवी साहित्य-सेवी थे। डॉ. चतुर्भुज के पुत्र और नाटककार डॉ. अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि डॉ. चतुर्भुज पिता ही नहीं आचार्य भी थे। जो कुछ भी...
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