शामली, नवम्बर 11 -- शहर के जैन धर्मशाला में श्री 108 विमर्ष सागर महामुनिराज ने जैन दीक्षा के महत्व, उसकी कठोरता और साधक के आत्म-साक्षात्कार की राह पर प्रकाश डाला। उन्होनेे कहा कि जैन धर्म में दीक्षा पावन और पवित्र परंपरा है, जिसमें 28 मूलगुणों का पालन आवश्यक होता है। साधक आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलते हुए केश लोचन जैसी कठिन तपस्या करते हैं, जो शरीर और मन दोनों की परीक्षा लेती है। इसे उन्होंने तलवार की धार पर चलने जैसा जीवन बताया जो दृढ़ता, संयम और त्याग का सर्वाेच्च प्रतीक है। आचार्य श्री ने शामली, मुजफ्फरनगर और दिल्ली के जैन समाजों की सेवा भावना की प्रशंसा करते हुए कहा कि इन समाजों ने मुनि संघ की सेवा में अनुकरणीय समर्पण दिखाया है। शामली समाज को उन्होंने गंगा-प्रयाग की उपमा देते हुए कहा कि समाज ने साधु-संघ की सेवा में तन-मन से सहयोग द...