नई दिल्ली, जनवरी 22 -- चाणक्य नीति में एक बहुत गहरा और कड़वा सत्य छिपा हुआ है। आचार्य चाणक्य कहते हैं -वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गन जीवनात्।प्राणत्यागे क्षणां दुःख मानभङ्गे दिने दिने॥ अर्थात - प्राण त्याग (मृत्यु) एक क्षण का दुख है, लेकिन मान-भंग यानी अपमान या इज्जत का टूटना जीवन भर रोज-रोज कष्ट देता है। चाणक्य का यह कथन बताता है कि इंसान के लिए शारीरिक मृत्यु से कहीं अधिक पीड़ादायक होता है, उसकी आत्मसम्मान का हनन। जब कोई व्यक्ति अपमानित होता है, उसकी इज्जत लुट जाती है या समाज में उसकी प्रतिष्ठा चोटिल हो जाती है, तो वह दर्द जीवन भर साथ चलता है। यह कष्ट इतना गहरा होता है कि कई बार व्यक्ति जीते-जी मरने जैसा महसूस करता है। चाणक्य नीति हमें सिखाती है कि इस दुख से कैसे बचा जाए और कैसे इस स्थिति से मुक्ति पाई जाए। आइए इस विषय को विस्तार से समझते...