मुजफ्फरपुर, मार्च 18 -- मुजफ्फरपुर। तेज रफ्तार इंटरनेट ने साइकिल पर सवार डाकियों के लिए कंक्रीट की सड़कें तो दूर गांव की पगडंडी तक जगह नहीं छोड़ी। तकनीक की मार के अलावा समाज की बेरुखी से भी इनकी अहमियत पर आंच आई है। कभी छत पर चढ़कर जिसकी आमद का इंतजार होता था, अब उसके लिए लोग जल्दी दरवाजा तक नहीं खोलते। यह सोचकर कि पता नहीं कोर्ट-कचहरी या बैंक लोन का कौन-सा नोटिस लेकर आया हो। चिट्ठियों का वजूद खत्म होने के बाद अब इनकी भूमिका आधार, पैन और सरकारी कागजात पहुंचाने तक रह गई है। इनका कहना है कि रही-सही कसर विभागीय उपेक्षा ने पूरी कर दी है। प्रधान डाकघर में डाकियों को बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। महीनों से भत्ते का इंतजार कर रहे हैं। दूसरों के घर सुखद संदेश पहुंचाने वाले अपने लिए भी विभाग से शुभ समाचार की आस में हैं। डेढ़ दशक पहले तक संवाद...
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