समीर उपाध्याय ज्योतिर्विद, सितम्बर 23 -- वैदिक ज्योतिष में छठे, आठवें और बारहवें भाव को दु:स्थान कहा गया है। छठे भाव से शत्रु, रोग और ऋण, आठवें से दुर्घटना, मृत्यु तथा बारहवें भाव से खर्च और कारावास का विचार किया जाता है, लेकिन इन भावों के स्वामी भी उत्तम कोटि के विपरीत राजयोग का निर्माण करते हैं । यह विपरीत राजयोग जिस भी जातक की कुंडली में हो, तो भले ही वह किसी गरीब के घर में जन्मा हो, जैसे - जैसे वह बड़ा होगा, वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ता जाएगा। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल होता है। फलित ज्योतिष में विपरीत राजयोग तीन प्रकार के होते हैं- हर्ष विपरीत राजयोग : छठे भाव के स्वामी ग्रह के छह, आठ या बारहवें भाव में विराजमान होने पर हर्ष विपरीत राजयोग बनता है। छठे घर के स्वामी ग्रह क...
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