देवघर, दिसम्बर 8 -- 1910 से 1975 का कालखंड बंगाली बाबूओं का स्वर्णकाल कहा जाता है। सैलानियों का शहर कभी कोठियों का शहर कहा जाता था। यहां की कोठियों का गौरवशाली इतिहास बाबू मोशाय से जुड़ी यादों को समेटे हुए है। वक्त की ऐसी मार पड़ी कि कोठियां नजर से ओझल होने लगी। माहौल भी ऐसा बदला कि कोठी छोड़कर चला जाना ही लोगों ने मुनासिब समझा। मार्बल हाउस, साधु संघ, जहाज कोठी, खिरोद भवन, रेडकोर्ट के झरोखा से उस अतीत को देखा जा सकता है। इन कोठियों को धरोहर के रूप में संजोकर रखने की जरूरत है। ताकि पर्यटक यहां आकर यहां के अतीत से वाकिफ हो सकें। यूरोपियन शैली से बनी सैकड़ों कोठिया आज भी बंगाली बाबुओं के अतीत की याद दिलाती है। कोठियों की साज-सज्जा, रंग-बिरंगे फूलों की बगिया का मनोरम दृश्य बरबस लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। आज भी ऐसी कुछ कोठियां बाग से निक...