भभुआ, अक्टूबर 10 -- (नुक्कड़ पर चुनाव) रामगढ़। देवहलियां रोड में साधु की चाय दुकान। जोर-जोर की आवाज आ रही थी। आवाज सुन बटोही बाबा उधर ही बढ़ गए। नजदीक पहुंचे और बेंच पर बैठ गए। सियासत पर बहस जारी थी। मुराहू बोले जा रहे थे कि पार्टी पॉलिटिक्स का तमाशा अजबे है भाई। हर दल में खेमाबंदी है। एक-दूसरे का पत्ता काटने की होड़। दल एक है, पर दिल है कि मिलता हीं नहीं। 'सबसे चौकस हमही क कमान संभालम। मुराहू ने जब यह बात सुनी तो पान की गिलौरी दाबे भावनाथ की हंसी ऐसी इतराई कि मुंह की पिचकारी से कुर्ता बदरंग होके हीं माना। भावनाथ बोले, भाई मुराहू ई मुद्दा कहां से कबार लाए। मुराहू बोले भइया देख नहीं रहे हैं। चुनाव नजदीक आया तो हर दलवे में खेमा-खेमा का खेल चालू हो गया है। पहिले नेताजी 'संवरूं खेमा को कमान दिए थे। तब 'मंगरू खेमा भितरे-भितरे पाल मार रहा था। अब ने...
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