ललितपुर, जनवरी 19 -- सिद्धचक्र महामण्डल विधान आत्मशुद्धि की अनुपम साधना है। यह याद दिलाता है कि सिद्धों का स्मरण ही संसार के बंधनों से मुक्ति का मार्ग है। जब साधु-संतों के मिलन में केवल देह नहीं, विचारों का भी संगम होता है। श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र गिरारगिरी जी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री अभयसागर जी महाराज ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि आज का युग भौतिकता की ओर अधिक झुक गया है, किंतु जैन दर्शन आत्मसंयम, अहिंसा और समता का मार्ग दिखाता है, जिसे जीवन में उतारना ही सच्ची आराधना है। मुनिश्री समत्वसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि समत्व ही धर्म का प्राण है। सिद्धचक्र की आराधना तभी फलवती होती है, जब जीवन में राग-द्वेष का क्षय और समभाव का विकास हो। मुनि संघों का यह मिलन समाज के लिए संदेश है कि एकता, अनुशासन और श्रद्धा से ह...