वाराणसी, दिसम्बर 6 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। हमारे देश की गुरु-शिष्य परंपरा अद्भुत है। जिसे सीखना होता है वो कहीं से भी सीख लेता है। उसे अच्छा सीखने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती। सती अनुसुइया के पुत्र दत्तात्रेय भगवान ने चौबीस गुरु बनाए। उनके गुणों का उल्लेख किया। ये बातें मानसपीठ खजुरीताल, मैहर से आए जगद्गुरु स्वामी रामललाचार्य ने कहीं। वह भदैनी स्थित मारवाड़ी सेवा संघ परिसर में हो रही श्रीराम कथा के दूसरे दिन प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जगद्गुरु रामानंदाचार्य ऐसे आकाशधर्मा गुरु थे जिन्होंने समाज के सभी वर्ग को स्वीकार किया। उनके प्रमुख द्वादश शिष्यों ने भी अक्षय कीर्ति कमाई। कीर्ति-यश तो ठीक है लेकिन बात तब बने जब ठाकुरजी के दर्शन हो जाएं। ये द्वादश शिष्य ऐसे दर्शन प्राप्त महाभाग थे। जिस ब्रह्म को यति, महर्षि, योगी हज...